उत्तराखंड-का-गौरव

सुंदरलाल बहुगुणा (1927–2021) उत्तराखंड के पर्यावरण आंदोलन के महानायक थे। उन्होंने ‘चिपको आंदोलन’ के माध्यम से जंगलों को बचाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए जनजागरण किया। उनका मानना था कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि जल, वायु और मिट्टी के संरक्षक हैं। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग से संघर्ष किया। बहुगुणा जी ने अलकनंदा और टिहरी बाँध परियोजना के विरोध में लंबा अनशन भी किया। उनके प्रयासों ने न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर खींचा। उन्हें पद्मविभूषण सहित कई राष्ट्रीय सम्मान मिले। वे हमेशा “जंगल बचाओ, जीवन बचाओ” के संदेश के लिए याद किए जाते हैं।

बचेंद्री पाल का जन्म 1954 में उत्तरकाशी जिले के नाकुरी गाँव में हुआ। वे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं (1984), जिसने पूरे देश का गौरव बढ़ाया। बचपन से ही साहसिक गतिविधियों में रुचि रखने वाली बचेंद्री ने कई कठिन परिस्थितियों का सामना कर अपनी पहचान बनाई। उनका एवरेस्ट अभियान केवल पर्वतारोहण की उपलब्धि नहीं, बल्कि नारी सशक्तिकरण का प्रतीक भी बना। उन्होंने भारतीय पर्वतारोहण संस्थान में ट्रेनर के रूप में काम किया और अनेक युवा पर्वतारोहियों को प्रेरित किया। उन्हें पद्मभूषण और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बचेंद्री पाल आज भी साहस, आत्मविश्वास और धैर्य की मिसाल हैं।

जसपाल राणा का जन्म 1976 में टिहरी गढ़वाल जिले में हुआ। वे भारत के प्रख्यात निशानेबाज़ (शूटर) हैं। 1990 के दशक में ही उन्होंने एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। उनकी निशानेबाजी की कला और अनुशासन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई। उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उत्तराखंड के पहाड़ों से निकला यह युवा आज भी नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने और खेलों को बढ़ावा देने में सक्रिय है। जसपाल राणा का योगदान केवल पदकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे आने वाले खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी हैं।

नरेन्द्र सिंह नेगी (जन्म 1949, पौड़ी गढ़वाल) उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय लोकगायक हैं। उनके गीतों में पहाड़ की बोली, संस्कृति और भावनाओं की सजीव झलक मिलती है। उन्होंने 1000 से अधिक गीत लिखे और गाए हैं। नेगी जी की गायकी में सामाजिक मुद्दे, प्रवासियों की पीड़ा और प्रकृति का अद्भुत चित्रण मिलता है। उन्हें “गढ़ रत्न” की उपाधि दी गई है। उनके गीत उत्तराखंड की पहचान बन गए हैं और हर उत्सव, पर्व और सांस्कृतिक आयोजन में गाए जाते हैं। वे केवल गायक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षक हैं।

अजय भट्ट एक भारतीय-अमेरिकी कंप्यूटर आर्किटेक्ट हैं, जिनका जन्म 1957 में नैनीताल जिले में हुआ। वे USB (Universal Serial Bus) तकनीक के सह-आविष्कारक के रूप में प्रसिद्ध हैं। यह तकनीक आज पूरी दुनिया के कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स जगत में क्रांति ला चुकी है। उनके नवाचार ने डेटा ट्रांसफर और हार्डवेयर कनेक्टिविटी को सरल और तेज़ बना दिया। अजय भट्ट का योगदान इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड केवल संस्कृति और पर्यटन ही नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान रखता है। उनके नाम पर कई सम्मान दर्ज हैं और वे युवाओं को अनुसंधान और नवाचार की दिशा में प्रेरित करते हैं।

कैप्टन गौरव सिंह गुसाईं उत्तराखंड के उन वीर सपूतों में से हैं जिन्होंने भारतीय सेना में अद्वितीय योगदान दिया। पहाड़ की माटी में पले-बढ़े गौरव सिंह ने देश की सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया। दुश्मनों के सामने उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी शहादत से उत्तराखंड का हर नागरिक गौरवान्वित महसूस करता है। गुसाईं जैसे वीर जवानों की बदौलत ही भारत की सीमाएँ सुरक्षित हैं। वे युवाओं के लिए प्रेरणा हैं कि सच्चा गौरव राष्ट्रसेवा और त्याग में ही है।

मीना राणा को “गढ़ रत्न” और “कुमाऊँ की कोकिला” भी कहा जाता है। वे उत्तराखंड की प्रमुख लोकगायिका हैं और उनकी आवाज़ में पहाड़ी संस्कृति की गहरी मिठास झलकती है। उन्होंने सैकड़ों गीत गाए हैं जिनमें प्रेम, प्रकृति, लोककथाएँ और सामाजिक जीवन का वर्णन मिलता है। उनके गीत न केवल उत्तराखंड में, बल्कि प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच भी बेहद लोकप्रिय हैं। मीना राणा की गायकी ने गढ़वाली और कुमाऊँनी संगीत को नई ऊँचाई दी है। वे उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

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