उत्तराखंड का इतिहास वेदों, पुराणों और महाकाव्यों से लेकर आधुनिक काल तक फैला हुआ है। इसे देवभूमि कहा जाता है क्योंकि यहाँ केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे चार धाम स्थित हैं। प्राचीन काल में यह क्षेत्र कुरुक्षेत्र महाकाव्य और वैदिक संस्कृति का हिस्सा रहा। गुप्तकाल, कत्यूरी वंश और चंद वंश के शासन में उत्तराखंड ने धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य की उच्चता को प्राप्त किया। मध्यकाल में यहाँ गढ़वाल और कुमाऊँ अलग-अलग शक्ति केंद्र बने। ब्रिटिश शासन के समय यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से संगठित हुआ और स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहा। अंततः वर्ष 2000 में उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ। यह इतिहास सांस्कृतिक धरोहर, वीरता और आध्यात्मिकता की एक अमूल्य गाथा है।
उत्तराखंड, जिसे प्राचीन काल से “देवभूमि” के नाम से जाना जाता है, भारतीय संस्कृति और इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। हिमालय की गोद में बसा यह राज्य प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था और वीरता की परंपरा से समृद्ध है। यहाँ की नदियाँ—गंगा, यमुना, अलकनंदा और भागीरथी—न केवल जीवन का आधार रही हैं बल्कि संस्कृति और सभ्यता की जन्मभूमि भी रही हैं। उत्तराखंड का इतिहास अत्यंत प्राचीन, विविध और गौरवशाली है।
प्राचीन इतिहास:
वैदिक और पुराणकालीन संदर्भ
उत्तराखंड का उल्लेख वेदों और पुराणों में मिलता है। इसे कुरुक्षेत्र सभ्यता का हिस्सा माना जाता है। महाभारत में वर्णित कई घटनाएँ यहाँ की पर्वतीय घाटियों से जुड़ी हुई हैं। माना जाता है कि पांडवों ने अपने अंतिम समय में स्वर्गारोहण यात्रा यहीं से प्रारंभ की थी।
- केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थल वैदिक काल से ही पूजनीय रहे।
- ऋषि-मुनियों की तपस्थली ऋषिकेश, हरिद्वार, गंगोत्री और यमुनोत्री रहे हैं।
बौद्ध और जैन प्रभाव
गौतम बुद्ध के समय में भी यहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव देखने को मिलता है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा का मार्ग उत्तराखंड से होकर जाता था, जिससे व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ।
मध्यकालीन इतिहास:
कत्यूरी वंश (7वीं से 11वीं शताब्दी)
- कत्यूरी वंश उत्तराखंड का पहला बड़ा राजवंश माना जाता है।
- उनकी राजधानी बैराठ (वर्तमान बैजनाथ, बागेश्वर) थी।
- कत्यूरी शासकों ने मंदिर स्थापत्य और कला को बढ़ावा दिया। बैजनाथ और जागेश्वर के मंदिर इसी काल की देन हैं।
चंद वंश (11वीं से 18वीं शताब्दी)
- चंद शासकों ने कुमाऊँ क्षेत्र पर शासन किया।
- इस काल में कुमाऊँ की संस्कृति, भाषा (कुमाऊँनी) और लोक परंपराओं का विकास हुआ।
- उन्होंने किले और मंदिर बनाए, तथा कुमाऊँ में व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ाईं।
गढ़वाल का उदय
- पश्चिमी भाग में गढ़वाल का विकास हुआ।
- गढ़वाल के राजा पृथ्विपाल और अजयपाल ने यहाँ की राजनीतिक शक्ति को संगठित किया।
- चंद्रप्रकाश और प्रद्युम्न शाह जैसे गढ़वाल नरेशों ने संस्कृति और कला को बढ़ावा दिया।
आधुनिक इतिहास:
गोरखा शासन (1791–1815)
- 18वीं शताब्दी के अंत में गोरखाओं ने गढ़वाल और कुमाऊँ पर आक्रमण किया।
- उनका शासन अत्याचार और करभार की कठोरता के कारण अलोकप्रिय रहा।
ब्रिटिश शासन
- 1815 में सुगाौली संधि के बाद ब्रिटिशों ने कुमाऊँ और गढ़वाल को अपने अधीन कर लिया।
- ब्रिटिश शासन में शिक्षा, प्रशासन और आधुनिक बुनियादी ढाँचे का विकास हुआ।
- अल्मोड़ा, नैनीताल और मसूरी जैसे नगर ब्रिटिश काल में प्रमुख केंद्र बने।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
- कुमाऊँ और गढ़वाल के वीर सैनिकों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज़ादी तक कई आंदोलनों में भाग लिया।
- शहीद माधो सिंह भंडारी और गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी।
उत्तराखंड राज्य का गठन:
स्वतंत्रता के बाद उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा। पर्वतीय जनता ने अलग राज्य की माँग को लेकर लंबे समय तक आंदोलन चलाया।
- 1994 का कांडों की खटीमा और मुज़फ्फरनगर कांड ने राज्य आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
- 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड भारत का 27वाँ राज्य बना।
सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर
- उत्तराखंड में चार धाम यात्रा (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) का विशेष महत्व है।
- यहाँ की लोककला, लोकनृत्य (झोड़ा, छपेली, चांचरी) और लोकगीत इसकी विशिष्ट पहचान हैं।
- त्योहार जैसे उत्तरायणी, हरेला, फूलदेई और घी त्यार सांस्कृतिक एकता को प्रदर्शित करते हैं।
उत्तराखंड का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का ही नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति, अध्यात्म और जनता के संघर्षों का इतिहास है। प्राचीन वेदिक युग से लेकर आधुनिक स्वतंत्र भारत तक, इस क्षेत्र ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी है। देवभूमि कहलाने वाला उत्तराखंड आज भी भारतीय संस्कृति और आस्था का प्रमुख केंद्र है।