अंकिता भंडारी केस: आज की जांच की स्थिति

एक हत्या, कई सवाल

अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की गहन परीक्षा है। यह मामला शुरू से ही संदिग्ध परिस्थितियों, अधूरी जांच और दबाव के आरोपों से घिरा रहा है। दोषियों को सजा मिल चुकी है, लेकिन जांच की दिशा और दायरा आज भी सवालों के घेरे में है। यह खोजी रिपोर्ट पूरे घटनाक्रम को तथ्यों और सवालों के साथ सामने रखती है।

शुरुआत: सितंबर 2022 — गुमशुदगी नहीं, सुनियोजित साजिश?

18 सितंबर 2022 को 19 वर्षीय अंकिता भंडारी के लापता होने को शुरुआत में सामान्य गुमशुदगी बताया गया। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह सामान्य मामला था, तो रिज़ॉर्ट प्रबंधन ने शुरुआत से ही स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी? मोबाइल बंद होना, देर से शिकायत और विरोधाभासी बयान कई शंकाएँ पैदा करते हैं।

जांच में सामने आया कि अंकिता पर रिज़ॉर्ट से जुड़े लोगों द्वारा अनैतिक दबाव बनाया जा रहा था। यह केवल एक व्यक्ति का दबाव था या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा—यह सवाल यहीं से उठना शुरू हुआ। कुछ ही दिनों बाद अंकिता का शव चीला नहर से बरामद हुआ, जिसने गुमशुदगी की कहानी को हत्या में बदल दिया।

आरोपी: क्या तीन दोषी ही पूरी सच्चाई हैं?

पुलिस ने तीन आरोपियों—पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता—को गिरफ्तार किया। चार्जशीट में हत्या और सबूत मिटाने की बात कही गई। मई 2025 में कोर्ट ने तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

लेकिन जांच पर नजर डालें तो कई अहम सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। क्या इतने बड़े रिसॉर्ट में केवल तीन लोग ही फैसले लेने वाले थे? क्या कॉल डिटेल, विज़िटर लॉग और CCTV फुटेज की पूरी तरह स्वतंत्र जांच हुई? अदालत का फैसला मजबूत था, लेकिन जांच की सीमाएँ आज भी चर्चा का विषय हैं।

VIP विवाद: नाम नहीं, परछाइयाँ मौजूद

इस केस का सबसे संवेदनशील पहलू तथाकथित VIP एंगल है। ट्रायल के दौरान और उसके बाद भी यह आरोप लगते रहे कि कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका की जांच अधूरी रही। सोशल मीडिया पर वायरल कथित ऑडियो क्लिप्स और गवाहों के बयान इस संदेह को और मजबूत करते हैं।

हालांकि आधिकारिक एजेंसियों ने किसी VIP की संलिप्तता से इनकार किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर दिशा में समान रूप से जांच हुई? या कुछ नाम जांच की दहलीज तक आने से पहले ही बाहर रह गए? यही वह बिंदु है, जहां से जनता का भरोसा डगमगाता है।

जनता का गुस्सा: क्यों सड़क पर उतरा उत्तराखंड?

अगर जांच पूरी तरह संतोषजनक होती, तो शायद इतना व्यापक जनआंदोलन नहीं होता। उत्तराखंड के कई जिलों में लगातार प्रदर्शन हुए। नारे केवल दोषियों के खिलाफ नहीं थे, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ थे।

सोशल मीडिया अभियानों ने इस केस को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जनता यह पूछने लगी कि क्या रसूखदारों के मामलों में कानून की गति धीमी हो जाती है? यह जनदबाव ही था, जिसने सरकार को बार-बार सफाई देने पर मजबूर किया।

ताज़ा मोड़: CBI जांच — भरोसा या मजबूरी?

जनवरी 2026 में सरकार द्वारा CBI जांच की सिफारिश एक बड़ा कदम माना गया, लेकिन इसके पीछे का सवाल अहम है—यह निर्णय समय पर क्यों नहीं लिया गया? क्या यह कदम न्याय के लिए है या बढ़ते दबाव का परिणाम?

CBI के सामने चुनौती साफ है: पुराने सबूतों की दोबारा जांच, कथित VIP एंगल और यह तय करना कि क्या पहले की जांच में जानबूझकर कोई दिशा छोड़ी गई। यह जांच अब केवल अंकिता के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की साख के लिए अहम बन चुकी है।

आगे क्या?: न्याय बनाम सच्चाई

अंकिता के माता-पिता आज भी कहते हैं कि सजा पर्याप्त नहीं, सच्चाई जरूरी है। सवाल यह नहीं कि हत्या किसने की, बल्कि यह भी कि इसके पीछे किसका दबाव, किसका लाभ और किसकी चुप्पी थी।

आने वाले समय में CBI जांच यह तय करेगी कि यह मामला केवल तीन दोषियों तक सीमित रहेगा या एक बड़े तंत्र का पर्दाफाश होगा। अगर पूरी सच्चाई सामने आती है, तो यह केस भविष्य की जांचों के लिए मिसाल बन सकता है।

निष्कर्ष: एक केस, जो अभी खत्म नहीं हुआ

अंकिता भंडारी केस आज भी समाप्त नहीं हुआ है। अदालत का फैसला अंतिम हो सकता है, लेकिन जांच की कहानी अभी खुली किताब है। यह मामला बताता है कि न्याय केवल सजा से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और निर्भीक जांच से पूरा होता है। देवभूमि में न्याय की असली परीक्षा अभी बाकी है।

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